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गुलाम राष्ट्रवाद

गुलाम क्यों? भारत की गुलामी का आरंभ तो बहुत पहले हो गया था, डेरियस के समय से जब भारत का उत्तर पश्चिम यानी कि आज का बलूचिस्तान और थोड़ा आगे का पाकिस्तान ईरानियों के कब्जे में आ गया था, उक्त फायदा नुकसान दोनों था, घाव उन्होंने भी उतने ही दिए जितने मुस्लिमो ने दिए थे लेकिन हम नया घाव लगने पर पुराना भूल जाते हैं इसीलिए हम मुगलों को सल्तनत कालीन शासको से ज्यादा गाली देते हैं जबकि वे तो इनसे बहुत ज्यादा बर्बर थे। मुगलों ने तो भारत को नवीन सोच, नवीन कला, नवीन व्यवस्था नवीन सभ्यता दी थी कम से कम अकबर के काल के उत्तरार्द्ध से तो दी ही थी। इसीलिये टोडरमल उनके राजस्व मंत्री बने और मानसिंह उनके सेनापति उनका परम मित्र बीरबल बना अगर आपके पूर्वजो ने उन्हें भारत पर शासन करने योग्य माना था तो आप क्यों नही मान पा रहे। मैं बताता हूँ ऐसा क्यों हो रहा है। बर्बादी का आरंभ भक्ति आंदोलन- आज के सबसे अधिक बर्बर हिन्दू जो उत्तर भारत में रहते हैं उनकी बर्बादी का आरंभ एक प्रतिक्रियावादी और गुलाम मानसिकता को अपनाने से हुआ जो भक्ति आंदोलन से शुरू हुई। भक्ति आंदोलन में जितना भी संगीत विकसित हुआ वो दरबारी संगीत की छत्र...

बोझ

अब तो बस रो लेता हूँ किसी को बताता नहीं। गुनाहों का बोझ है सिर पे, जिन्हें खुद ही उठाना है।

जो करना है कर जा साथी

दुरूह लक्ष्य है, दुर्गम पथ है ऊंचे पर्वत सी चुनोतियाँ, झंझावत का कोलाहल है, क्या हुआ जो सागर जल अपार है, नौका तेरी, पतवार भी तेरी, बाजू तेरे ताकत तेरी, लड़ जा भीड़ जा चढ़ जा साथी, आशाएं अनंत है, अनंतिम प्रयास है जो करना हो कर जा साथी लड़ जा भीड़ जा चढ़ जा साथी

असाध्य

असाध्य है उस दुष्चेतना को शब्दों का रूप देना जो मेरे भीतर उभरती है  जब नई सुबह होती है उंगलियां मोबाईल में तुम्हारा नंबर डायल करती है, फिर रुक जाती है, उँगलियों के चलने और रुकने का समयान्तराल छोटा तो है लेकिन वह बोध जो उन्हें रुकने का आदेश देता है उसको शब्दो का रूप देना असंभव है टीस तो रह जाती है लेकिन वह तुम्हारी आवाज़ सुनने की उद्दाम वासना को नहीं दबा पाती, वह बोध जिसकी लहर ने बांधा था उँगलियों को बोना हो जाता है और बह जाता है  उंगलियां फिर मोबाईल के डायल पैड पर चली जाती है, मोबाईल से तरंगे तुम तक पहुच तो जाती है लेकिन मोबाइल की रिंग के साथ वह बोध फिर लौट आता है अदम्य शक्ति के साथ, सांसे नियंत्रण खोने लगती है, जवाब की प्रतीक्षा, प्रतीक्षा न रहकर आत्मग्लानि, भय और आशा का मिश्रित स्वरूप हो जाती है, कभी-कभी जवाब नहीं आता, तब सबकुछ शांत हो जाता है कुछ पल के लिए, सुकून सा छा जाता है,  लेकिन केवल तब तक ही जब तक टीस और तुम्हारी हँसी सुनने की वासना लौट नहीं आती। कभी कभी जवाब आता है और तुम उड़ती तितली की तरह सब कुछ रंगीन कर देती हो, वह मिश्रण हवा हो जाता है, और अभिलाषाओं का जत्था ...

दुनिया

क्या है यह दुनिया  शंकर का दर्शन या हॉकिन्स का विज्ञान स्याह दृष्टि या दृष्टि भ्रम है, या बस एक ऐनक है जो रंग कर देता है स्याह भूख है या रोटी की महक है यह दुनिया, या भ्रम है कि भूख है, या रोटी ही भ्रम है लोहा पिट रही मुस्कान है यह दुनिया या आंखों में पल रहा कोई ख्वाब,  बाप का अनुशासन या माँ का दुलार है या किसी बंजारे का गीत है, चल पड़े दरख्तों का अफसाना है दुनिया या रो पड़े समंदर का गान है हवस से खड़ी हुई इस दुनिया के भीतर पल रहा कोई निःस्वार्थ प्यार है मौत के संगीत की धुन है यह दुनिया या नवजात शिशु के रूप का सौंदर्य है बुद्ध के आनंद का प्रवाह है यह दुनिया या चार्वाक की भौतिकता की पुकार है, स्वप्न दृष्टा मन की अनेक दुनिया, या की विकल्पों के अभावों का सत्य है, अनवरत फैलती आकाशगंगा सत्य है या प्रतिदिन सिकुड़ती सोच का प्रतिबिंब है यह दुनिया, मंदिर मस्जिद की दीवार है यह दुनिया या हरिया और जुम्मन का फुटपाथ है सेक्स की बेहोशी दुनिया का सत्य है या  प्रेमवश माथे पर होंठों का गीला स्पर्श शक्ति की हवस का प्रवाह है यह दुनिया या शांति की चेतना का प्रवाह है क्या है यह दुनिया

तुम न होती तो

कभी कभी सोचता हूँ तुम न होती तो क्या होता?? अगर तुम न होती तो चाँद मेरा आशियाँ होता,  जहां बैठे निहारता में सुंदर पृथ्वी तुम अगर न होती तो मैं आग होता और जला देता हर अस्तित्व जो अन्यों के अस्तित्व पर खतरा है,  मैं बादल होता और आवश्यक अनावश्यक बरस पड़ता, और बहा ले जाता किनारे, बिखैर देता नवयौवना मृदा। सारे इम्तिहानों का हल मेरी मुट्ठी में होता और सारे परिणाम मेरे होते। हर लक्ष्य जो मैंने चाहा मेरे कदमो में होता, मेरे हर निर्णय हर कदम के पीछे ऐसी समझदारी होती जिसपर दुनिया ईर्ष्या करती और आहें भरती। अगर तुम न होती तो मैं कभी न रोता, न ही किसी किये का पछतावा होता। तुम न होती तो मैं रातो को चाँद की खोज में न निकलता, न वटवृक्षों की छाँह में खोजता धूप के टुकड़े, तुम न होती तो मेरे अहाते की उस चिड़िया पर मेरी नज़र ही न पड़ती जो रोज़ जमा लेती है जमघट न गिलहरियों से गुफ़्तगू होती, न मैं किसी सारस, बगुले या किसी अटपटे से जीव की खोज में निकल पाता पिता की चिंताएं कुछ कम होती और माँ का काम थोड़ा हल्का होता। तुम्हारे बगैर मैं खेल के समापन से पहले घर न आया करता और आंख खुलते ही चिंता का रुधिर मेरे हृद...

दर्द और आँसू

जब कोई पुत्र, पिता को खो देता है तो वह उत्तरदायित्व के उस दलदल में खुद को झोंक देता है जिसमे वह अपनी लगभग प्रत्येक लालसा की हत्या स्वयम कर देता है, उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है वह एक नवीन जीवन को धारण करता है जिसमे वह स्वयं को त्याग कर एक नवजीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति से खुद को जोड़ देता है, उन्ही भावो की अभिव्यक्ति इस कविता में प्रकट हुई है। टूटी हुई डाली के कुसुम मुस्कान को त्याग देते हैं। न जाने क्यों,  टूटी तो केवल डाली है वे तो नहीं टूटे। वे तो अब तक उसी आँचल को थामे हैं जिनको थामे उन्होंने फूल बनने तक का सफर तय किया है, उनका जीवन उस डाली से जुड़ा रहा अब तक शायद इसलिए मुस्कान चली गई,  उनका जीवन भी कुछ अंतिम क्षणों का साक्षी रहा, डाली के साथ उन्होंने भी देदी तिलांजलि अपने जीवन की। जाते जाते वे मिट्टी को नवीन जीवन का वरदान दे गए तब भी।  आखिर आनंद और मुस्कान के सिवा भी उनके जीवन का लक्ष्य था,  नवीन सृजन।  नवीन रंगों की अभिव्यक्ति। प्रियतम से मिलन के सुख का आभास,  उन्होंने यह जिम्मेदारी उस नवीन जीवन को सौंप दी।

अधिकारी बनने का पहला दिन

मैंने अधिकारी बनने का सपना 7 बरस पहले देखा था। लेकिन अधिकारी कैसे बनना है यह मुझे आज मालूम चला 17 मार्च 2021 को, अंधेरे जंगल में, काले आसमान जिनमे बरसो बाद ऐसी उजियाली देखी। दिल्ली में तो तारे नजर ही कहाँ आते हैं। वहां तो बड़ी मुश्किल से वसंत में थोड़े बहुत तारे नज़र आने लगते हैं। पलाश के पेड़ो पर लगे फूल के रंग और मनुष्य के उन फूलों के रंग को खुद पर चढ़ाने की लालसा की पूर्ति करने के क्रम में जो आभासी रंग मनुष्य पर चढ़ता है, इन दोनों की अभिव्यक्त तीव्रता में जितना अंतर होता है उतना ही दिल्ली और यहां के आसमान के रंगों में था। इस योवन भरी एकम (अमावस्या के दूसरे दिन) का चांद मुस्कुरा रहा था। इस खूबसूरत पल मुझे ज्ञान की प्राप्ति हुई कि मुझे अधिकारी कैसे बनना है। मेरी तरह कलेक्टरी की चाहत की अंधियारी गली में भटके नौजवानी खो चुके नौजवानों को बाबा कहा जाता था मुझे नहीं, ऐसा क्यों था उन लड़कों में और मुझमे क्या फर्क था यह मुझे कुछ कुछ समझ आता था। मुझे उतना ही पता था जितना परीक्षा को पास करने के लिए ज्ञान चाहिए उससे ज्यादा नहीं इसीकारण उनके हर उल्टे सीधे सवाल का मुझे एक ही जवाब पता था कि यह परीक्षा मे...

Eight immortals according to Indian mythologies भारतीय आख्यानों के अनुसार आठ चिरंजीवी

अमर होना या अमरता को प्राप्त करने का स्वप्न मनुष्य  पृथ्वी पर अपनी उपस्थिति के आरंभिक काल से ही देखता रहा है। भारतीय आख्यानों में भी 8 ऐसे मनुष्यों का उल्लेख हैं जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है। यह श्रृंखला आपका परिचय इन्हीं immortals से करवाने वाली है। आप उनसे परिचित हैं मैं आपको उस कहानी से परिचित करवाऊंगा जिनका अंत उनकी अमरता पर होगा। इसके अतिरिक्त वह क्षण जब उन्हें अंतिम बार देखा गया उसका वर्णन भी मैं आपके समक्ष रखूंगा।

धर्म

हम अक्सर सुनते हैं यदि धर्म का आविष्कार न हुआ होता तो यह दुनिया अधिक शांत होती। मजहबी जुनूनो ने इस दुनिया को पागलपन की हद तक हिंसक बना दिया है। ईसाई लड़े, इस्लाम लड़े भी आपस में लड़े। ऐसी ही कुछ लड़ाइयां भारत में भी हुई हैं लेकिन उनका प्रकार अलग रहा है उनका प्रकार रचनात्मक रहा है लेकिन उतना ही रोचक जितना वे हिंसक संघर्ष थे। वैदिक धर्म के आदि स्वरूप की व्याख्याओं से इसका आरम्भ हुआ। ब्राह्मण रचे गए टिकाये लिखी गई। इसी क्रम में विरोधी या कहे नवीन विचार भी सामने आए, इस क्रम में आरण्यक और उपनिषद लिखे गए। इन्होंने कर्मकांडो को चुनौती दी, वैदिक धर्म की प्रार्थना भौतिक जगत तथा इहलोक तक सीमित थी, उपनिषदों ने इन्हें जटिल बना दिया तथा भारत में पारलौकिक जीवन पर तथा वहां के जीवन पर मंथन होने लगा। जीवन, मृत्यु, आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, जगत, माया, पुनर्जन्म आदि सिद्धांतो का प्रतिपादन इन्ही ग्रंथों में हुआ है। तथा ये नए विचार बहुत तेजी से पुराने विचारों को समाप्त करने में सफल हो गए तथा सारे आध्यात्म जगत पर छा गए। किन्तु कर्मकांड तथा वर्ण व्यवस्था जो खंडन मण्डन के मुख्य कारण थे समाप्त नही हुए। वे समाप्त हु...