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तुम न होती तो

कभी कभी सोचता हूँ तुम न होती तो क्या होता??
अगर तुम न होती तो चाँद मेरा आशियाँ होता, 
जहां बैठे निहारता में सुंदर पृथ्वी
तुम अगर न होती तो मैं आग होता और जला देता हर अस्तित्व जो अन्यों के अस्तित्व पर खतरा है, 
मैं बादल होता और आवश्यक अनावश्यक बरस पड़ता,
और बहा ले जाता किनारे, बिखैर देता नवयौवना मृदा।
सारे इम्तिहानों का हल मेरी मुट्ठी में होता और सारे परिणाम मेरे होते।
हर लक्ष्य जो मैंने चाहा मेरे कदमो में होता,
मेरे हर निर्णय हर कदम के पीछे ऐसी समझदारी होती जिसपर दुनिया ईर्ष्या करती और आहें भरती।
अगर तुम न होती तो मैं कभी न रोता, न ही किसी किये का पछतावा होता।
तुम न होती तो मैं रातो को चाँद की खोज में न निकलता,
न वटवृक्षों की छाँह में खोजता धूप के टुकड़े,
तुम न होती तो मेरे अहाते की उस चिड़िया पर मेरी नज़र ही न पड़ती जो रोज़ जमा लेती है जमघट
न गिलहरियों से गुफ़्तगू होती, न मैं किसी सारस, बगुले या किसी अटपटे से जीव की खोज में निकल पाता
पिता की चिंताएं कुछ कम होती और माँ का काम थोड़ा हल्का होता।
तुम्हारे बगैर मैं खेल के समापन से पहले घर न आया करता और आंख खुलते ही चिंता का रुधिर मेरे हृदय की धड़कनों की बारंबारता को न बढ़ा पाता।
मूढो की दुनियां में मेरा दर्जा राजा सा होता।
तुम न होती तो मैं जोगी होता, इस दुनयावी जंगल में भटकता रहता, ज्ञान की खोज में।
तुम न होती तो मैं सिद्ध होता, 
मार्क्स नहीं जॉब्स मेरा आदर्श होता,
तुम न होती तो मैं इस रुदन के स्थान पर कोई थ्योरम लिख रहा होता।
मैं गहनतम शून्य से भी गहन होता।
तुम्हारे बगैर न मुझमे ईर्ष्या होती, न जलन, न तड़प, न चाहत होती।
तुम न होती तो मैं तृष्णा के सागर को सुखा कर धूल कर देता।
लब्बोलुआब इतना ही है कि तुम न होती तो मैं, मैं न होता।।

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