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अधिकारी बनने का पहला दिन

मैंने अधिकारी बनने का सपना 7 बरस पहले देखा था। लेकिन अधिकारी कैसे बनना है यह मुझे आज मालूम चला 17 मार्च 2021 को, अंधेरे जंगल में, काले आसमान जिनमे बरसो बाद ऐसी उजियाली देखी। दिल्ली में तो तारे नजर ही कहाँ आते हैं। वहां तो बड़ी मुश्किल से वसंत में थोड़े बहुत तारे नज़र आने लगते हैं। पलाश के पेड़ो पर लगे फूल के रंग और मनुष्य के उन फूलों के रंग को खुद पर चढ़ाने की लालसा की पूर्ति करने के क्रम में जो आभासी रंग मनुष्य पर चढ़ता है, इन दोनों की अभिव्यक्त तीव्रता में जितना अंतर होता है उतना ही दिल्ली और यहां के आसमान के रंगों में था। इस योवन भरी एकम (अमावस्या के दूसरे दिन) का चांद मुस्कुरा रहा था। इस खूबसूरत पल मुझे ज्ञान की प्राप्ति हुई कि मुझे अधिकारी कैसे बनना है। मेरी तरह कलेक्टरी की चाहत की अंधियारी गली में भटके नौजवानी खो चुके नौजवानों को बाबा कहा जाता था मुझे नहीं, ऐसा क्यों था उन लड़कों में और मुझमे क्या फर्क था यह मुझे कुछ कुछ समझ आता था। मुझे उतना ही पता था जितना परीक्षा को पास करने के लिए ज्ञान चाहिए उससे ज्यादा नहीं इसीकारण उनके हर उल्टे सीधे सवाल का मुझे एक ही जवाब पता था कि यह परीक्षा में नही आएगा। इस कारण में चिल्गोजो की गिनती में आता था नए चूजों की। लेकिन आज मुझे बाबा होने का अहसास हो रहा था। मैं अत्यंत सहज होने की अनुभूति को महसूस कर रहा था। लंबे समय बाद मेरे अंदर संतोष था। मन प्रफुल्लित हो रहा था, गोल्ड फ्लैक के हर कश के साथ मेरे अंदर ज्ञान उतर रहा था। मैंने आज कैवल्य को प्राप्त कर लिया है और में महावीर हो गया हूँ यह अहसास मेरे भीतर हृदय के अंतिम पड़ाव तक को भीगा रहा था। मैंने अपने आप पर विजय पा ली थी, मुझे कोई होश नहीं रहा कि मेरी ट्रैन आउटर पर खड़ी है और सिग्नल होते ही चल देगी मुझे यह भी ध्यान नहीं रहा कि मैं पटरियों के बीच में खड़ा हूँ और ट्रेन कभी भी आकर मेरे सपनों को अपनी तरह निर्जीव बना सकती है मैं बेहोशी में था, सिगरेट के हर कश के साथ में आसमान को धुंआ छोड़ता हुआ ताकता तो पता नहीं धुंए के छूटने के साथ या उस रात के अंधियार की शक्ति के प्रभाव से  आलोक सा मेरे भीतर भर रहा था मैं आनंद की चरम अवस्था में था। आज मुझे पता लग गया था कि मैं कैसे अधिकारी बन सकता हूँ, मैंने आज बाबा के पद की योग्यता धारण कर ली है। मैं इस रस का आनंद भोग ही रहा था कि एक रेलवे पुलिस कांस्टेबल ने मुझे आवाज दी ऐ सिगरेट छोड़ और ट्रेन पर चढ़ जा । आम दिनों में,  मैं क्षण भर मेें उसके आदेश का पालन करता और ऊपर हो लेता लेकिन आज अलग दिन था, मैंने अपनी सिगरेट को उसकी और बढ़ाया और कहा महाराज, दो चार कश लगा लीजिये, ट्रैन का क्या भरोसा कब तक रुकी रहे। पता नही क्यों लेकिन वह चला गया और में फिर से आनंद में मगन हो गया।

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हम अक्सर सुनते हैं यदि धर्म का आविष्कार न हुआ होता तो यह दुनिया अधिक शांत होती। मजहबी जुनूनो ने इस दुनिया को पागलपन की हद तक हिंसक बना दिया है। ईसाई लड़े, इस्लाम लड़े भी आपस में लड़े। ऐसी ही कुछ लड़ाइयां भारत में भी हुई हैं लेकिन उनका प्रकार अलग रहा है उनका प्रकार रचनात्मक रहा है लेकिन उतना ही रोचक जितना वे हिंसक संघर्ष थे। वैदिक धर्म के आदि स्वरूप की व्याख्याओं से इसका आरम्भ हुआ। ब्राह्मण रचे गए टिकाये लिखी गई। इसी क्रम में विरोधी या कहे नवीन विचार भी सामने आए, इस क्रम में आरण्यक और उपनिषद लिखे गए। इन्होंने कर्मकांडो को चुनौती दी, वैदिक धर्म की प्रार्थना भौतिक जगत तथा इहलोक तक सीमित थी, उपनिषदों ने इन्हें जटिल बना दिया तथा भारत में पारलौकिक जीवन पर तथा वहां के जीवन पर मंथन होने लगा। जीवन, मृत्यु, आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, जगत, माया, पुनर्जन्म आदि सिद्धांतो का प्रतिपादन इन्ही ग्रंथों में हुआ है। तथा ये नए विचार बहुत तेजी से पुराने विचारों को समाप्त करने में सफल हो गए तथा सारे आध्यात्म जगत पर छा गए। किन्तु कर्मकांड तथा वर्ण व्यवस्था जो खंडन मण्डन के मुख्य कारण थे समाप्त नही हुए। वे समाप्त हु...