असाध्य है उस दुष्चेतना को शब्दों का रूप देना जो मेरे भीतर उभरती है जब नई सुबह होती है उंगलियां मोबाईल में तुम्हारा नंबर डायल करती है, फिर रुक जाती है, उँगलियों के चलने और रुकने का समयान्तराल छोटा तो है लेकिन वह बोध जो उन्हें रुकने का आदेश देता है उसको शब्दो का रूप देना असंभव है टीस तो रह जाती है लेकिन वह तुम्हारी आवाज़ सुनने की उद्दाम वासना को नहीं दबा पाती, वह बोध जिसकी लहर ने बांधा था उँगलियों को बोना हो जाता है और बह जाता है उंगलियां फिर मोबाईल के डायल पैड पर चली जाती है, मोबाईल से तरंगे तुम तक पहुच तो जाती है लेकिन मोबाइल की रिंग के साथ वह बोध फिर लौट आता है अदम्य शक्ति के साथ, सांसे नियंत्रण खोने लगती है, जवाब की प्रतीक्षा, प्रतीक्षा न रहकर आत्मग्लानि, भय और आशा का मिश्रित स्वरूप हो जाती है, कभी-कभी जवाब नहीं आता, तब सबकुछ शांत हो जाता है कुछ पल के लिए, सुकून सा छा जाता है, लेकिन केवल तब तक ही जब तक टीस और तुम्हारी हँसी सुनने की वासना लौट नहीं आती। कभी कभी जवाब आता है और तुम उड़ती तितली की तरह सब कुछ रंगीन कर देती हो, वह मिश्रण हवा हो जाता है, और अभिलाषाओं का जत्था ...