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Showing posts from April, 2021

जो करना है कर जा साथी

दुरूह लक्ष्य है, दुर्गम पथ है ऊंचे पर्वत सी चुनोतियाँ, झंझावत का कोलाहल है, क्या हुआ जो सागर जल अपार है, नौका तेरी, पतवार भी तेरी, बाजू तेरे ताकत तेरी, लड़ जा भीड़ जा चढ़ जा साथी, आशाएं अनंत है, अनंतिम प्रयास है जो करना हो कर जा साथी लड़ जा भीड़ जा चढ़ जा साथी

असाध्य

असाध्य है उस दुष्चेतना को शब्दों का रूप देना जो मेरे भीतर उभरती है  जब नई सुबह होती है उंगलियां मोबाईल में तुम्हारा नंबर डायल करती है, फिर रुक जाती है, उँगलियों के चलने और रुकने का समयान्तराल छोटा तो है लेकिन वह बोध जो उन्हें रुकने का आदेश देता है उसको शब्दो का रूप देना असंभव है टीस तो रह जाती है लेकिन वह तुम्हारी आवाज़ सुनने की उद्दाम वासना को नहीं दबा पाती, वह बोध जिसकी लहर ने बांधा था उँगलियों को बोना हो जाता है और बह जाता है  उंगलियां फिर मोबाईल के डायल पैड पर चली जाती है, मोबाईल से तरंगे तुम तक पहुच तो जाती है लेकिन मोबाइल की रिंग के साथ वह बोध फिर लौट आता है अदम्य शक्ति के साथ, सांसे नियंत्रण खोने लगती है, जवाब की प्रतीक्षा, प्रतीक्षा न रहकर आत्मग्लानि, भय और आशा का मिश्रित स्वरूप हो जाती है, कभी-कभी जवाब नहीं आता, तब सबकुछ शांत हो जाता है कुछ पल के लिए, सुकून सा छा जाता है,  लेकिन केवल तब तक ही जब तक टीस और तुम्हारी हँसी सुनने की वासना लौट नहीं आती। कभी कभी जवाब आता है और तुम उड़ती तितली की तरह सब कुछ रंगीन कर देती हो, वह मिश्रण हवा हो जाता है, और अभिलाषाओं का जत्था ...

दुनिया

क्या है यह दुनिया  शंकर का दर्शन या हॉकिन्स का विज्ञान स्याह दृष्टि या दृष्टि भ्रम है, या बस एक ऐनक है जो रंग कर देता है स्याह भूख है या रोटी की महक है यह दुनिया, या भ्रम है कि भूख है, या रोटी ही भ्रम है लोहा पिट रही मुस्कान है यह दुनिया या आंखों में पल रहा कोई ख्वाब,  बाप का अनुशासन या माँ का दुलार है या किसी बंजारे का गीत है, चल पड़े दरख्तों का अफसाना है दुनिया या रो पड़े समंदर का गान है हवस से खड़ी हुई इस दुनिया के भीतर पल रहा कोई निःस्वार्थ प्यार है मौत के संगीत की धुन है यह दुनिया या नवजात शिशु के रूप का सौंदर्य है बुद्ध के आनंद का प्रवाह है यह दुनिया या चार्वाक की भौतिकता की पुकार है, स्वप्न दृष्टा मन की अनेक दुनिया, या की विकल्पों के अभावों का सत्य है, अनवरत फैलती आकाशगंगा सत्य है या प्रतिदिन सिकुड़ती सोच का प्रतिबिंब है यह दुनिया, मंदिर मस्जिद की दीवार है यह दुनिया या हरिया और जुम्मन का फुटपाथ है सेक्स की बेहोशी दुनिया का सत्य है या  प्रेमवश माथे पर होंठों का गीला स्पर्श शक्ति की हवस का प्रवाह है यह दुनिया या शांति की चेतना का प्रवाह है क्या है यह दुनिया

तुम न होती तो

कभी कभी सोचता हूँ तुम न होती तो क्या होता?? अगर तुम न होती तो चाँद मेरा आशियाँ होता,  जहां बैठे निहारता में सुंदर पृथ्वी तुम अगर न होती तो मैं आग होता और जला देता हर अस्तित्व जो अन्यों के अस्तित्व पर खतरा है,  मैं बादल होता और आवश्यक अनावश्यक बरस पड़ता, और बहा ले जाता किनारे, बिखैर देता नवयौवना मृदा। सारे इम्तिहानों का हल मेरी मुट्ठी में होता और सारे परिणाम मेरे होते। हर लक्ष्य जो मैंने चाहा मेरे कदमो में होता, मेरे हर निर्णय हर कदम के पीछे ऐसी समझदारी होती जिसपर दुनिया ईर्ष्या करती और आहें भरती। अगर तुम न होती तो मैं कभी न रोता, न ही किसी किये का पछतावा होता। तुम न होती तो मैं रातो को चाँद की खोज में न निकलता, न वटवृक्षों की छाँह में खोजता धूप के टुकड़े, तुम न होती तो मेरे अहाते की उस चिड़िया पर मेरी नज़र ही न पड़ती जो रोज़ जमा लेती है जमघट न गिलहरियों से गुफ़्तगू होती, न मैं किसी सारस, बगुले या किसी अटपटे से जीव की खोज में निकल पाता पिता की चिंताएं कुछ कम होती और माँ का काम थोड़ा हल्का होता। तुम्हारे बगैर मैं खेल के समापन से पहले घर न आया करता और आंख खुलते ही चिंता का रुधिर मेरे हृद...