जब कोई पुत्र, पिता को खो देता है तो वह उत्तरदायित्व के उस दलदल में खुद को झोंक देता है जिसमे वह अपनी लगभग प्रत्येक लालसा की हत्या स्वयम कर देता है, उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है वह एक नवीन जीवन को धारण करता है जिसमे वह स्वयं को त्याग कर एक नवजीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति से खुद को जोड़ देता है, उन्ही भावो की अभिव्यक्ति इस कविता में प्रकट हुई है। टूटी हुई डाली के कुसुम मुस्कान को त्याग देते हैं। न जाने क्यों, टूटी तो केवल डाली है वे तो नहीं टूटे। वे तो अब तक उसी आँचल को थामे हैं जिनको थामे उन्होंने फूल बनने तक का सफर तय किया है, उनका जीवन उस डाली से जुड़ा रहा अब तक शायद इसलिए मुस्कान चली गई, उनका जीवन भी कुछ अंतिम क्षणों का साक्षी रहा, डाली के साथ उन्होंने भी देदी तिलांजलि अपने जीवन की। जाते जाते वे मिट्टी को नवीन जीवन का वरदान दे गए तब भी। आखिर आनंद और मुस्कान के सिवा भी उनके जीवन का लक्ष्य था, नवीन सृजन। नवीन रंगों की अभिव्यक्ति। प्रियतम से मिलन के सुख का आभास, उन्होंने यह जिम्मेदारी उस नवीन जीवन को सौंप दी।