Skip to main content

Posts

Showing posts from March, 2021

दर्द और आँसू

जब कोई पुत्र, पिता को खो देता है तो वह उत्तरदायित्व के उस दलदल में खुद को झोंक देता है जिसमे वह अपनी लगभग प्रत्येक लालसा की हत्या स्वयम कर देता है, उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है वह एक नवीन जीवन को धारण करता है जिसमे वह स्वयं को त्याग कर एक नवजीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति से खुद को जोड़ देता है, उन्ही भावो की अभिव्यक्ति इस कविता में प्रकट हुई है। टूटी हुई डाली के कुसुम मुस्कान को त्याग देते हैं। न जाने क्यों,  टूटी तो केवल डाली है वे तो नहीं टूटे। वे तो अब तक उसी आँचल को थामे हैं जिनको थामे उन्होंने फूल बनने तक का सफर तय किया है, उनका जीवन उस डाली से जुड़ा रहा अब तक शायद इसलिए मुस्कान चली गई,  उनका जीवन भी कुछ अंतिम क्षणों का साक्षी रहा, डाली के साथ उन्होंने भी देदी तिलांजलि अपने जीवन की। जाते जाते वे मिट्टी को नवीन जीवन का वरदान दे गए तब भी।  आखिर आनंद और मुस्कान के सिवा भी उनके जीवन का लक्ष्य था,  नवीन सृजन।  नवीन रंगों की अभिव्यक्ति। प्रियतम से मिलन के सुख का आभास,  उन्होंने यह जिम्मेदारी उस नवीन जीवन को सौंप दी।

अधिकारी बनने का पहला दिन

मैंने अधिकारी बनने का सपना 7 बरस पहले देखा था। लेकिन अधिकारी कैसे बनना है यह मुझे आज मालूम चला 17 मार्च 2021 को, अंधेरे जंगल में, काले आसमान जिनमे बरसो बाद ऐसी उजियाली देखी। दिल्ली में तो तारे नजर ही कहाँ आते हैं। वहां तो बड़ी मुश्किल से वसंत में थोड़े बहुत तारे नज़र आने लगते हैं। पलाश के पेड़ो पर लगे फूल के रंग और मनुष्य के उन फूलों के रंग को खुद पर चढ़ाने की लालसा की पूर्ति करने के क्रम में जो आभासी रंग मनुष्य पर चढ़ता है, इन दोनों की अभिव्यक्त तीव्रता में जितना अंतर होता है उतना ही दिल्ली और यहां के आसमान के रंगों में था। इस योवन भरी एकम (अमावस्या के दूसरे दिन) का चांद मुस्कुरा रहा था। इस खूबसूरत पल मुझे ज्ञान की प्राप्ति हुई कि मुझे अधिकारी कैसे बनना है। मेरी तरह कलेक्टरी की चाहत की अंधियारी गली में भटके नौजवानी खो चुके नौजवानों को बाबा कहा जाता था मुझे नहीं, ऐसा क्यों था उन लड़कों में और मुझमे क्या फर्क था यह मुझे कुछ कुछ समझ आता था। मुझे उतना ही पता था जितना परीक्षा को पास करने के लिए ज्ञान चाहिए उससे ज्यादा नहीं इसीकारण उनके हर उल्टे सीधे सवाल का मुझे एक ही जवाब पता था कि यह परीक्षा मे...