Skip to main content

असाध्य

असाध्य है उस दुष्चेतना को शब्दों का रूप देना
जो
मेरे भीतर उभरती है 
जब
नई सुबह होती है उंगलियां मोबाईल में तुम्हारा नंबर डायल करती है, फिर रुक जाती है,
उँगलियों के चलने और रुकने का समयान्तराल छोटा तो है लेकिन वह बोध जो उन्हें रुकने का आदेश देता है
उसको शब्दो का रूप देना असंभव है
टीस तो रह जाती है लेकिन वह तुम्हारी आवाज़ सुनने की उद्दाम वासना को नहीं दबा पाती,
वह बोध जिसकी लहर ने बांधा था उँगलियों को बोना हो जाता है और बह जाता है 
उंगलियां फिर मोबाईल के डायल पैड पर चली जाती है,
मोबाईल से तरंगे तुम तक पहुच तो जाती है लेकिन मोबाइल की रिंग के साथ वह बोध फिर लौट आता है अदम्य शक्ति के साथ, सांसे नियंत्रण खोने लगती है, जवाब की प्रतीक्षा, प्रतीक्षा न रहकर आत्मग्लानि, भय और आशा का मिश्रित स्वरूप हो जाती है,
कभी-कभी जवाब नहीं आता, तब सबकुछ शांत हो जाता है कुछ पल के लिए, सुकून सा छा जाता है, 
लेकिन केवल तब तक ही जब तक टीस और तुम्हारी हँसी सुनने की वासना लौट नहीं आती।
कभी कभी जवाब आता है और तुम उड़ती तितली की तरह सब कुछ रंगीन कर देती हो, वह मिश्रण हवा हो जाता है, और अभिलाषाओं का जत्था आकर मेरे मस्तिष्क की सभी जानी अनजानी परतों को ढक लेता है, पीछे से आनंद आकर गुदगुदाने लगता है,
लेकिन कभी कभी जवाब तो आता है लेकिन वह जवाब नहीं होता, वह सवाल होता है जिसका मेरे पास कोई जवाब नहीं होता, आत्मग्लानि, भय और आशा के मिश्रण से बाद के 2 हवा हो जाते हैं, और कुछ नया आकर जुड़ता है, 
कुछ ऐसा जिसे शब्दो में उतारना असाध्य है।
लेकिन सुबह तो फिर से होती है और फिर से यही चक्र दोहराया जाता है।


Comments

Popular posts from this blog

धर्म

हम अक्सर सुनते हैं यदि धर्म का आविष्कार न हुआ होता तो यह दुनिया अधिक शांत होती। मजहबी जुनूनो ने इस दुनिया को पागलपन की हद तक हिंसक बना दिया है। ईसाई लड़े, इस्लाम लड़े भी आपस में लड़े। ऐसी ही कुछ लड़ाइयां भारत में भी हुई हैं लेकिन उनका प्रकार अलग रहा है उनका प्रकार रचनात्मक रहा है लेकिन उतना ही रोचक जितना वे हिंसक संघर्ष थे। वैदिक धर्म के आदि स्वरूप की व्याख्याओं से इसका आरम्भ हुआ। ब्राह्मण रचे गए टिकाये लिखी गई। इसी क्रम में विरोधी या कहे नवीन विचार भी सामने आए, इस क्रम में आरण्यक और उपनिषद लिखे गए। इन्होंने कर्मकांडो को चुनौती दी, वैदिक धर्म की प्रार्थना भौतिक जगत तथा इहलोक तक सीमित थी, उपनिषदों ने इन्हें जटिल बना दिया तथा भारत में पारलौकिक जीवन पर तथा वहां के जीवन पर मंथन होने लगा। जीवन, मृत्यु, आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, जगत, माया, पुनर्जन्म आदि सिद्धांतो का प्रतिपादन इन्ही ग्रंथों में हुआ है। तथा ये नए विचार बहुत तेजी से पुराने विचारों को समाप्त करने में सफल हो गए तथा सारे आध्यात्म जगत पर छा गए। किन्तु कर्मकांड तथा वर्ण व्यवस्था जो खंडन मण्डन के मुख्य कारण थे समाप्त नही हुए। वे समाप्त हु...