हम अक्सर सुनते हैं यदि धर्म का आविष्कार न हुआ होता तो यह दुनिया अधिक शांत होती। मजहबी जुनूनो ने इस दुनिया को पागलपन की हद तक हिंसक बना दिया है। ईसाई लड़े, इस्लाम लड़े भी आपस में लड़े। ऐसी ही कुछ लड़ाइयां भारत में भी हुई हैं लेकिन उनका प्रकार अलग रहा है उनका प्रकार रचनात्मक रहा है लेकिन उतना ही रोचक जितना वे हिंसक संघर्ष थे। वैदिक धर्म के आदि स्वरूप की व्याख्याओं से इसका आरम्भ हुआ। ब्राह्मण रचे गए टिकाये लिखी गई। इसी क्रम में विरोधी या कहे नवीन विचार भी सामने आए, इस क्रम में आरण्यक और उपनिषद लिखे गए। इन्होंने कर्मकांडो को चुनौती दी, वैदिक धर्म की प्रार्थना भौतिक जगत तथा इहलोक तक सीमित थी, उपनिषदों ने इन्हें जटिल बना दिया तथा भारत में पारलौकिक जीवन पर तथा वहां के जीवन पर मंथन होने लगा। जीवन, मृत्यु, आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, जगत, माया, पुनर्जन्म आदि सिद्धांतो का प्रतिपादन इन्ही ग्रंथों में हुआ है। तथा ये नए विचार बहुत तेजी से पुराने विचारों को समाप्त करने में सफल हो गए तथा सारे आध्यात्म जगत पर छा गए। किन्तु कर्मकांड तथा वर्ण व्यवस्था जो खंडन मण्डन के मुख्य कारण थे समाप्त नही हुए। वे समाप्त हुए बोद्ध और जैन सिद्धांतों के प्रतिपादन के बाद, इनमे भी मुख्यतः बौद्ध सिद्धांतो के कारण किन्तु पूर्णतया नहीं, वे भी अपने अलग रूपों में जारी रहे। किसी पारलौकिक सिद्धांत या मृत्यु की व्याख्याओं का जितना वृहद भौतिक परिणाम हमें मिस्र के पिरामिडों के रूप में देखते हैं, उतना ही भारत में पहले महापाषाण काल और उसके पूर्व के काल में कब्रों के रूप में और आगे बढ़ते हुए पहले बौद्ध स्तूप, चैत्य और विहारों में, तथा और बाद में वृहद मंदिरों के रूप में देख सकते हैं। लेकिन बात अभी संघर्षों की तथा उन प्रवृतियों की हो रही है जिन्होंने वर्तमान भारतीय जीवन को गढ़ा। भारत में सिद्धांतो का प्रतिपादन तथा प्रत्येक सिद्धांत को चुनौती देने तथा उसके प्रति मत प्रकट करना हमेशा से सुलभ रहा है। वाद विवाद भारतीय आध्यात्मिक जीवन का अंग रहे हैं। इन्हीं वाद विवाद और उनके परिणाम प्रभावों पर धर्म की यह श्रृंखला प्रकाश डालेगी।
कभी कभी सोचता हूँ तुम न होती तो क्या होता?? अगर तुम न होती तो चाँद मेरा आशियाँ होता, जहां बैठे निहारता में सुंदर पृथ्वी तुम अगर न होती तो मैं आग होता और जला देता हर अस्तित्व जो अन्यों के अस्तित्व पर खतरा है, मैं बादल होता और आवश्यक अनावश्यक बरस पड़ता, और बहा ले जाता किनारे, बिखैर देता नवयौवना मृदा। सारे इम्तिहानों का हल मेरी मुट्ठी में होता और सारे परिणाम मेरे होते। हर लक्ष्य जो मैंने चाहा मेरे कदमो में होता, मेरे हर निर्णय हर कदम के पीछे ऐसी समझदारी होती जिसपर दुनिया ईर्ष्या करती और आहें भरती। अगर तुम न होती तो मैं कभी न रोता, न ही किसी किये का पछतावा होता। तुम न होती तो मैं रातो को चाँद की खोज में न निकलता, न वटवृक्षों की छाँह में खोजता धूप के टुकड़े, तुम न होती तो मेरे अहाते की उस चिड़िया पर मेरी नज़र ही न पड़ती जो रोज़ जमा लेती है जमघट न गिलहरियों से गुफ़्तगू होती, न मैं किसी सारस, बगुले या किसी अटपटे से जीव की खोज में निकल पाता पिता की चिंताएं कुछ कम होती और माँ का काम थोड़ा हल्का होता। तुम्हारे बगैर मैं खेल के समापन से पहले घर न आया करता और आंख खुलते ही चिंता का रुधिर मेरे हृद...
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