Skip to main content

गुलाम राष्ट्रवाद

गुलाम क्यों?
भारत की गुलामी का आरंभ तो बहुत पहले हो गया था, डेरियस के समय से जब भारत का उत्तर पश्चिम यानी कि आज का बलूचिस्तान और थोड़ा आगे का पाकिस्तान ईरानियों के कब्जे में आ गया था, उक्त फायदा नुकसान दोनों था, घाव उन्होंने भी उतने ही दिए जितने मुस्लिमो ने दिए थे लेकिन हम नया घाव लगने पर पुराना भूल जाते हैं इसीलिए हम मुगलों को सल्तनत कालीन शासको से ज्यादा गाली देते हैं जबकि वे तो इनसे बहुत ज्यादा बर्बर थे। मुगलों ने तो भारत को नवीन सोच, नवीन कला, नवीन व्यवस्था नवीन सभ्यता दी थी कम से कम अकबर के काल के उत्तरार्द्ध से तो दी ही थी। इसीलिये टोडरमल उनके राजस्व मंत्री बने और मानसिंह उनके सेनापति उनका परम मित्र बीरबल बना अगर आपके पूर्वजो ने उन्हें भारत पर शासन करने योग्य माना था तो आप क्यों नही मान पा रहे। मैं बताता हूँ ऐसा क्यों हो रहा है।
बर्बादी का आरंभ भक्ति आंदोलन-
आज के सबसे अधिक बर्बर हिन्दू जो उत्तर भारत में रहते हैं उनकी बर्बादी का आरंभ एक प्रतिक्रियावादी और गुलाम मानसिकता को अपनाने से हुआ जो भक्ति आंदोलन से शुरू हुई। भक्ति आंदोलन में जितना भी संगीत विकसित हुआ वो दरबारी संगीत की छत्रछाया में सृजित हुआ जिसके कारण राजा का संगीत अलग हो गया और प्रजा का अलग और यह सामान्य बात है कि प्रजा का संगीत ही प्रजा में ज्यादा मान्यता प्राप्त करेगा। इसी कारण मानस, सूर के पद, मीरा के पद ज्यादा प्रसिद्ध हुए बजाय के दरबार के परीक्षित संगीत के हालांकि इसमें भी कोई बुराई नहीं है लेकिन बुराई है इनकी प्रेरणा में। असल में हुआ यह कि क्रांति की प्रेरणा से क्रांति के गीत पैदा होते हैं और कायर मानसिकता से भक्ति गीत, हमारी कायरता ने हमे किसी पर निर्भर रहने की प्रेरणा दी और हम किस पर निर्भर हुए जो हमारी पहुच में था-- भगवान। हमने भगवान का रास्ता चुना दक्षिण में भक्ति भगवान की शुरू हुई और उत्तर आते हुए उसका रूप बदल गया उन्होंने भगवान की भक्ति में गीत लिखे, नृत्य विकसित किये संगीत विकसित किया, ऊंचे ऊंचे सूंदर मंदिर बनवाए क्या नहीं किया और अपनी एक सभ्यता विकसित की। अपनी भाषा अपना खानपान परिष्कृत किया, अपने नगर बसाए और आपने क्या किया लोकतंत्र के नाम पर उन्हें गुलाम बना लिया उन्हें बर्बाद कर दिया लेकिन वह तुम्हारी तरह बर्बर चरवाहे नहीं रहे और यहां पर प्रजा और राजा में दूरी हो गई। लेकिन प्रजा की मानसिकता गुलामी वाली रही जिसमे भगवान को हमने राजा मान लिया और प्रजा रूपी याचक हम हो गए। इसलिए आपकी मानसिकता गुलामो वाली है आपने मंदिर बनाये उनमे संगीत विकसित हुआ जिन्हें मुस्लिम राजाओ ने परिष्कृत किया है लेकिन राष्ट्रवाद के नाम पर तुमने उसे छोड़ दिया, उन्होंने चित्रकला बनाई तुमने छोड़ दिया बंगाल ने उसी काल में अपना समाज परिष्कृत किया जिससे आज बंगाल भी स्वतंत्र विचार और कला का संरक्षक बना बैठा है लेकिन आप रहे अंधे आपको कुछ भी दे दिया जाए आप उसका करेंगे क्या लाठी टेक कर चल देंगे। इससे ज्यादा आपसे कुछ होगा नही। तो आपको शायद अब समझ आया होगा कि क्यों आपकी मानसिकता गुलाम है।
गुलाम राष्ट्रवाद के विकास में औरंगजेब और उत्तर मुगल कालीन शासको की भूमिका---

Comments

Popular posts from this blog

धर्म

हम अक्सर सुनते हैं यदि धर्म का आविष्कार न हुआ होता तो यह दुनिया अधिक शांत होती। मजहबी जुनूनो ने इस दुनिया को पागलपन की हद तक हिंसक बना दिया है। ईसाई लड़े, इस्लाम लड़े भी आपस में लड़े। ऐसी ही कुछ लड़ाइयां भारत में भी हुई हैं लेकिन उनका प्रकार अलग रहा है उनका प्रकार रचनात्मक रहा है लेकिन उतना ही रोचक जितना वे हिंसक संघर्ष थे। वैदिक धर्म के आदि स्वरूप की व्याख्याओं से इसका आरम्भ हुआ। ब्राह्मण रचे गए टिकाये लिखी गई। इसी क्रम में विरोधी या कहे नवीन विचार भी सामने आए, इस क्रम में आरण्यक और उपनिषद लिखे गए। इन्होंने कर्मकांडो को चुनौती दी, वैदिक धर्म की प्रार्थना भौतिक जगत तथा इहलोक तक सीमित थी, उपनिषदों ने इन्हें जटिल बना दिया तथा भारत में पारलौकिक जीवन पर तथा वहां के जीवन पर मंथन होने लगा। जीवन, मृत्यु, आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, जगत, माया, पुनर्जन्म आदि सिद्धांतो का प्रतिपादन इन्ही ग्रंथों में हुआ है। तथा ये नए विचार बहुत तेजी से पुराने विचारों को समाप्त करने में सफल हो गए तथा सारे आध्यात्म जगत पर छा गए। किन्तु कर्मकांड तथा वर्ण व्यवस्था जो खंडन मण्डन के मुख्य कारण थे समाप्त नही हुए। वे समाप्त हु...

तुम न होती तो

कभी कभी सोचता हूँ तुम न होती तो क्या होता?? अगर तुम न होती तो चाँद मेरा आशियाँ होता,  जहां बैठे निहारता में सुंदर पृथ्वी तुम अगर न होती तो मैं आग होता और जला देता हर अस्तित्व जो अन्यों के अस्तित्व पर खतरा है,  मैं बादल होता और आवश्यक अनावश्यक बरस पड़ता, और बहा ले जाता किनारे, बिखैर देता नवयौवना मृदा। सारे इम्तिहानों का हल मेरी मुट्ठी में होता और सारे परिणाम मेरे होते। हर लक्ष्य जो मैंने चाहा मेरे कदमो में होता, मेरे हर निर्णय हर कदम के पीछे ऐसी समझदारी होती जिसपर दुनिया ईर्ष्या करती और आहें भरती। अगर तुम न होती तो मैं कभी न रोता, न ही किसी किये का पछतावा होता। तुम न होती तो मैं रातो को चाँद की खोज में न निकलता, न वटवृक्षों की छाँह में खोजता धूप के टुकड़े, तुम न होती तो मेरे अहाते की उस चिड़िया पर मेरी नज़र ही न पड़ती जो रोज़ जमा लेती है जमघट न गिलहरियों से गुफ़्तगू होती, न मैं किसी सारस, बगुले या किसी अटपटे से जीव की खोज में निकल पाता पिता की चिंताएं कुछ कम होती और माँ का काम थोड़ा हल्का होता। तुम्हारे बगैर मैं खेल के समापन से पहले घर न आया करता और आंख खुलते ही चिंता का रुधिर मेरे हृद...

अधिकारी बनने का पहला दिन

मैंने अधिकारी बनने का सपना 7 बरस पहले देखा था। लेकिन अधिकारी कैसे बनना है यह मुझे आज मालूम चला 17 मार्च 2021 को, अंधेरे जंगल में, काले आसमान जिनमे बरसो बाद ऐसी उजियाली देखी। दिल्ली में तो तारे नजर ही कहाँ आते हैं। वहां तो बड़ी मुश्किल से वसंत में थोड़े बहुत तारे नज़र आने लगते हैं। पलाश के पेड़ो पर लगे फूल के रंग और मनुष्य के उन फूलों के रंग को खुद पर चढ़ाने की लालसा की पूर्ति करने के क्रम में जो आभासी रंग मनुष्य पर चढ़ता है, इन दोनों की अभिव्यक्त तीव्रता में जितना अंतर होता है उतना ही दिल्ली और यहां के आसमान के रंगों में था। इस योवन भरी एकम (अमावस्या के दूसरे दिन) का चांद मुस्कुरा रहा था। इस खूबसूरत पल मुझे ज्ञान की प्राप्ति हुई कि मुझे अधिकारी कैसे बनना है। मेरी तरह कलेक्टरी की चाहत की अंधियारी गली में भटके नौजवानी खो चुके नौजवानों को बाबा कहा जाता था मुझे नहीं, ऐसा क्यों था उन लड़कों में और मुझमे क्या फर्क था यह मुझे कुछ कुछ समझ आता था। मुझे उतना ही पता था जितना परीक्षा को पास करने के लिए ज्ञान चाहिए उससे ज्यादा नहीं इसीकारण उनके हर उल्टे सीधे सवाल का मुझे एक ही जवाब पता था कि यह परीक्षा मे...